झूला

नायिका एक झूले पर बैठे हुए हौले से झूल रही है।

हौले से ढलते हुए सूरज को देख रही है।

हौले से हवा बह रही है …

वो हवा हीं ये कहानी हमसे कह रही है।

नायक धीरे-से चलते हुए नायिका के करीब आता है। कुछ कहता है। दर्शकों को न तो नायक दिखाई देता है, और न उसकी आवाज सुनाई देती है। परछाई ही उसका दृश्य है, और ठहराव, उसकी वाणी।

मैं क्या कर रही हूँ? झूला झूल रही हूँ।

हाँ, साइड वाला झूला खाली है।

हाँ, हाँ, आओ, बैठो।

… 

क्या, मेरी कहानी सुननी है? 

… 

हाँ? फिर तो तुम्हें मेरे साथ झूलना पड़ेगा।

…  

क्या? झूला झूलना नहीं आता? चलो  मैं सिखा देती हूँ।

. . . .  

पीछे हो जब झूला तो तुम कसके बाजू तान लो,

आगे आने पर तुम खुद को धक्का देना जान लो,

एक बार तुम हिम्मत करके अर्श में गोता मारो तो —

नहीं गिराएगा तुमको ये झूला ये तुम मान लो ।।

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(नायक से डर की अभिव्यक्ति, नायिका से झुंझलाहट की)

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जिस गद्दी पर हो बैठे तुम उसका तो सम्मान करो,

जिस रस्सी को है पकड़ा, तुम उससे तो पहचान करो,

हाँ, लगेगा डर थोड़ा, उस डर का भी अपना गुण है,

साहस से आगे बढ़कर उस डर का भी तुम मान करो ।।

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देखो, कितने लोग यहाँ हैं, पर झूले गिनती के चार,

देखो, कितने भोग यहाँ हैं, पर दुखड़ा रोता संसार,

तुम्हें नहीं मैंने बोला, तुम स्वयं ही आकर बैठे हो,

साथ निभाओ मेरा अब तुम, ना मानो झूले से हार ।।

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यह समझो की, झूले का तो सार झूलने में हीं है,

यह समझो की, भोले का त्योहार भूलने में ही है,

खुद की वृद्धि से तुम खुद ही क्यों कतराते, ओ साथी,

छैल-छबीली कोंपल का विस्तार फूलने में ही है ।।

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(नायक कुछ नाकामयाब कोशिशों के बाद ढंग से झूलने लगता है, नायिका खुशी से कहती है)

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अरे वाह! बहुत खूब!

देखा, कितना आसान था झूला झूलना! 

अब मेरे साथ झूलों, मेरे समकालीन झूलों।

(सिर पकड़कर) ओह-हो, वो भी सिखाना पड़ेगा… 

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मेरे साथ चलो तुम ऊपर, मेरे साथ चलो नीचे,

साथ चलो ढीला छोड़े और साथ ही रस्सी को खींचे,

और यदि संयोग पड़े ऐसा हम गिर जाए झूले पर से,

साथ हमारे आँसू टपके, साथ ही हम आँखें मीचे ।।

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हाँ, होगा थोड़ा मुश्किल, हम अलग-अलग झूलों पर है,

अलग-अलग हैं हम भँवरे और अलग-अलग फूलों पर है,

पर जग ने इन सब भेदों की कद्र न करना सीखा, रे,

यहाँ भेद अलग मौलिकता पर, यहाँ भेद अलग मूलों पर है ।।

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और स्त्रोत हमारा एक, जनम का और मरण का फेरा एक,

एक हमारा उजियारा और घोर-घनन अंधेरा एक,

एक हमारी मंज़िल है, प्रत्येक पथिक है हमराही,

जंग हमारी रोज़मर्रा की एक, रैन-बसेरा एक ।।

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एक अगर है श्रद्धा तो फिर धर्म अलग होने से क्या,

एक हमारे तन-मन-धन तो वस्त्र अलग होने से क्या,

एक पेड़ के फल आखिर कितने ही भिन्न हो सकते है,

एक हमारी लय है तो झूला भी अलग होने से क्या ।। 

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एक प्रणय है, व्यक्त करे फिर भिन्न-हजारों भावों से,

एक प्रलय है, रक्त बहे फिर भिन्न-हजारों घावों से,

दिल की धड़कन मिल जाने पर साथ चलेगा झूला भी,

एक नदी है, पथिक चले फिर भिन्न-हजारों नावों से ।।

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(नायक नायिका के समकालीन झूलना सीख जाता है; यह देख कर नायिका अत्यंत प्रसन्नता से कहती है)

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क्या बात है ! तुम तो बड़ी ही जल्द साथ निभाना भी सीख गए। 

चलो, अब मैं भी अपना वादा निभाती हूँ, तुम्हें अपनी कहानी सुनाती हूँ . . . 

कहा से सुनाना शुरू करू?

… 

क्या!? शुरु से? बड़ा वक्त लगेगा।

… 

चलेगा? चलो, फिर उस दिन से शुरुआत करती हूँ जब मैं इस बाग मे पहली बार आई थी। और जब मैं पहली दफ़ा इस झूले से मिली थी।

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मानवता से दूर भागकर निकल चली थी मैं वन में,

आतुरता से चूर, हारकर, विकल जली थी मैं मन में,

झिलमिल चन्दा की छितरन से एक कली थी उपवन में,

धुंधले नभ में ध्रुव-तारे की कमी खली थी उलझन में ।।

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सैर करने थी मैं निकली, बाग में जब इक सवेरे,

थे हज़ारों जन वहाँ पे, था न कोई साथ मेरे,

नाम का बस था सवेरा, थी न उसमे दृश्यता,

सुर्ख-सुमंगल सूरज को थे घनन-घनेरे मेघा घेरे ।।

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गहरे बादल थे छाए, थी एक परिधि आशा की,

निर्जन उपवन मे जैसे हो एक झड़ी बिपाशा की,

इस झूले को देखा मैंने दूर बाग के कोने में,

पुनरजन्मी मेरे अंदर लौ बचपन की अभिलाषा की ।।

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सामान्य धारणाओ की सीमाओं से परे, सपनों की फुसफुसाहट और अनंत काल की गूँज के बीच बसे उस उद्यान में, एक अकेला झूला खड़ा था। जिसकी लकड़ी की पट्टी एक प्राचीन पेड़ के अनुराग से बनी थी, जो अनगिनत अतीतों की हवाओं से ऋतुक्षरित थी। और तारों के कणों के धागों से बुनी हुई रस्सिया इसके दोनों ओर लटकी हुई थी।

यह झूला शाश्वत ब्रह्मांड के एक अशाश्वत उद्यान में मौजूद था, एक ऐसा स्थान जहाँ विचार आकार लेते थे और भावनाएं चंद्रिका में नृत्य करती थीं। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ ब्रह्मांड के पार से आत्माएं अस्तित्व की संरचना का पता लगाने के लिए इकट्ठा होती थीं…  झूले की हल्की-हल्की लहरों से निर्देशित होती थीं।

उस झूले के आगे एक रहस्यमय व्यक्ति खड़ा था जिसे “झूले के पहरेदार” के नाम से जाना जाता था। आकाशगंगा जैसी आंखों और ब्रह्मांड की आवृत्तियों के साथ तालमेल बिठाने वाली आवाज के साथ वह झूले का और इसके रहस्यों का संरक्षक था।

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ज्यों ही दौड़े मैं पहुंची थी, उस सुंदर झूले के पास,

त्यों ही रोका, कहा किसी ने, “यह मंगल झूला है खास,

“पहरेदार हूँ इस झूले का, तुम्हें न ऐसे जाने दूंगा,

पहले समझो झूला क्या है, फिर करना इसका एहसास ।।

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मैं थोड़ा डरने लगी… लौटने का विचार करने लगी,

आखिर कौन है यह “झूले का पहरेदार” सोचने लगी।

मन तो था मेरा की कह दूँ काफी कुछ,

एक तरफ था झूला, लेकिन, एक तरफ बाकी सब कुछ।

जैसे-तैसे खुद को रोका, न बाद मे पछताऊँगी,

बोली “बोलो क्या है झूला?”, बिना न झूले जाऊँगी ।।

… 

पता है, उस झूले के पहरेदार ने मुझसे क्या कहा? यह कहा:

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तख्त मुलायम देकर तुमको, कुर्सी बनती है झूला,

हवा के बहने से झुकती जो, पेड़ों की शाखा झूला,

हुक पर लटका, लौ को रखकर, लालटेन भी है झूला,

हवा के बहने से हौले से हिलता पर्दा भी झूला ।।

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पंखे की वो ब्लेड हवा जो चीरे वो भी है झूला,

वीणा से जो स्वर था निकला फैला बनकर वो झूला,

संगीत बना जो राग, ताल, सुर, बाजे से वो भी झूला,

वादक, वीणा, गायक, श्रोता, सबका है अपना झूला ।।

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गति बदलती न उसकी, हाँ, समय का पहिया भी झूला,

लहरों मे हिलती-डुलती वो नौका भी तो है झूला,

स्थिरता का प्रतीक बना जो, लहराता झण्डा झूला,

द्वारसन्धि से घूम रहा वो दरवाजा भी है झूला ।।

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चन्दा, सूरज, धरती झूले, अपनी त्रिज्या का झूला,

हमे लगा की आठ पहर, दिन-रात हमारा है झूला,

ऊपर-नीचे चलता रहता, जीवन भी तो है झूला,

सुख औ’ दुख में झूल रहा खुद, हर दिन ये जीवन-झूला ।।

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झूमर झूमा, झाड़ू झड़का, झप्पी-झगड़ा भी झूला,

झंकृत झरने, झुमके झनके, झीले, झेलम भी झूला,

झाड़ी, झण्डा, झींगुर झुकता, झांकी, झलकी भी झूला,

झ से झूला झ से झूले, झ झूले झन-झन झूला ।।

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दरवाजा भी है झूला औ’ उसकी कुंडी भी झूला,

उसपर ताला भी झूला औ’ उसकी चाबी भी झूला,

उस चाबी का चंचल छल्ला भी झूले जैसे ही झूला,

उस चंचल छल्ले को पकड़े, रखवाला भी तो हैं झूला ।।

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चंचनलता से छल करता ये, हम सब का ही मन झूला,

दिल की धड़कन लय से चलती, धक-धक करता वह झूला,

भेद कल्पना की सीमाएँ, स्वप्न बने मन का झूला,

सागर भी ज्वारों के दोलन से बन जाता जल-झूला ।।

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उड़े तितली जब, उसके पर भी, पवन चीर बनते झूला,

भाव हजारों उमड़े मन में, चिंतन करता मन झूला,

तर्क-वाद का युद्ध चले, संवाद स्वयं बनता झूला,

नृत्य दिखाती नचनी के पग, भूतल पर आशु झूला ।।

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मौसम क्या है, सूरज-बादल आदि के बल से झूला?

टूटा तारा या फिर टूटा रस्सी से उसका झूला?

योगी करता है, आसान, या, घटता श्वासी का झूला?

ध्यान लगाते साधु के भी श्वास-रक्त झूले झूला ।।

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चुंबक का चुंबक से चुंबन, ना हो जब तक, वो झूला,

ष्क्रॉडिन्जर की बिल्ली न मृत, न जीवित, सहसा झूला,

चित्रकार का ब्रश भी कागज पर फिरता बनता झूला,

अणू, परमाणु और अवपरमाणु सब झूले झूला ।।

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झूले की रूपकता ही जब बन जाए खुद भी झूला,

लिखे कवि कलम-झूले से, उस पर कविता का झूला,

मिले न झूले का तुकांत, जो, न भूला, फूला, झूला,

सुंदरता से परितृप्ति तक, झूले से मिलता झूला ।।

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… और अचानक से वो झूले का पहरेदार वहाँ से गायब हो गया। कुछ देर तक तो मैं स्तब्ध खड़ी रही… उसके वापस आने का इंतज़ार करती रही। पर वह झूले का पहरेदार तो मानो सिर्फ झूलनेवाले को झूले से मिलाने के लिए ही वहाँ रहता था — परिचय के परे तो जैसे उसका अस्तित्व ही न था। मैं झूले पर बैठ गई और झूलने लगी… पता ही न चला की कब मैं खुद भी धीरे-धीरे झूले की पहरेदार बनने लगी । सोचने लगी की यह झूला मेरे लिए क्या है।

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फिर एक दिन एक छोटी बच्ची उस उद्यान में पहुंची। उसकी आवाज पेड़ों की पत्तियों के बीच से सरसराती हुई हल्की हवा की तरह थी, उसके दिल के सवाल इतने गहरे थे कि तारे भी प्रत्याशा में कांपने लगे थे। बचपने का भार थामने वाली आँखों से वह एक के बाद एक सवाल पूछने लगी,

“क्या मैं किसी के बिना धक्का दिए झूल रही हूँ?”

“बड़े लोग झूला क्यों नहीं झूलते?”

“झूले के दूसरी तरफ क्या है?”

“जोर से झूलूँ तो झूला टूटेगा तो नहीं?”

“गोल घूमकर वापस सीधा हो जाएगा या नहीं?”

उस पल में मुझे समझ आया कि झूला एक दर्पण था, जो अस्तित्व के सार को दर्शाता था। यह एक अनुस्मारक था कि जीवन, एक झूले की तरह, पकड़ने और छोड़ने के बीच, प्रयास और समर्पण के बीच एक नाजुक संतुलन है। 

और उस उद्यान के उस छोटे से कोने मे मुझे वह उत्तर मिला जो मैंने सब जगह खोजा था: झूले का रहस्य ही, जीवन का रहस्य था। कि वास्तव में जीने के लिए व्यक्ति को अस्तित्व के झूले को अपनाना होगा, ज्ञात और अज्ञात, दृश्य और अदृश्य के बीच झूलते रहना होगा। की दुनिया में हर धक्का और खिंचाव, हर उत्थान और पतन, एक अनुस्मारक है कि मैं भी इस दुनिया का हिस्सा हूँ।

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(नायिका नायक टी तरफ मुड़ती है और कहती है)

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धन्यवाद करती मैं तुमको, आए मेरे जीवन में,

साथी बन झूले पर बैठे, छाए मेरे ही मन में,

जिस कोने में दिखा था झूला, मिले परस्पर थे जहाँ हम,

तुमसे मिलकर बना वो उत्तम, दिव्य पक्ष इस उपवन में ।।

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जिस की थी यहाँ खोज सबको, बाग में था गुमशुदा,

कोई तो थी चीज़, जिसको, कहते थे ईश्वर-ख़ुदा,

प्रियतम, तुमसे मिलकर मिल गया, जो भी था पहले तक गुम,

मिली स्वयं से मैं जो पहले, खुद-ही-खुद से थी जुदा ।।

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नासमझ, नादान थी मैं, था न मुझको ये पता —

बाग एक ही है, उसी में, है ख़ुशी और है ख़ता,

जो न समझे बनता है पथ कंकड़-पत्थर से मिल के,

वो है चलता हर पग पर उस रास्ते को कोसता ।।

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(नायिका ऊपर देख कर खुद से कहती है)

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सफ़र पूर्ण चलने हेतु, आया अब कोई पास है मेरे,

साथ झूलना है सौभाग्य, ख्वाब न कोई खास है मेरे,

सुनकर मेरी कहानी, उसने, साथ निभाया यात्रा में, पर,

झूला जब तक झूलेगा, क्या तब तक वो साथ है मेरे?

इतने में आते देखा उन्होंने दो बच्चों को पास,

समझ गए वो खत्म हुआ इस उपवन में अब उनका वास,

बिन बोले कुछ उठ गए वो और चले अपने असली घर में,

यह झूला घर था बच्चों का अब, उनकी गाथा थी इतिहास ।।

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जीवन का सार समझने के लिए, नहीं चाहिए ‘मधुशाला’,

संतुलन का मोल न जाने, वो जो भर उठता हाला,

एक बार तुम आ कर देखो, अंतर्मन के उपवन में,

धर्म तुम्हारा क्या है, तुमको, हाँ सिखलाएगा झूला ।।।

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All life is bound together by mutual support and interdependence.

Acharya UmaswaTi