अनुस्वाद

अनुस्वाद, जिसे अंग्रेज़ी में “aftertaste” कहते है, उसका हिंदी में ज़िक्र थोड़ा कम है । और जिस चीज़ का ज़िक्र ही नहीं होता, उस पर सही-ग़लत का सवाल उठाना भी कठिन हो जाता है। उसे एक रूपक की तरह इस्तेमाल करना तो मानो अपने आप में ही एक अनुस्वाद है ।

हालात कुछ ऐसे हैं मेरे कि, साइकिल चलना तो आता है। 

मगर किसी के पीछे बैठने की, हसरत से दिल ललचाता है ।।

बर्फ़ के गोले तो मैंने भी, खाये कई दफ़ा है। 

परन्तु यारी के स्वाद से, महरूम दिल ख़फ़ा है ।। 

इस पेचीदा दुनिया में,  मैत्रेयी दीप जला लो —

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

सीख ली अरबों तक है गिनती, सूत्र विधि मैं गाता हूँ । 

लुकाछिपी में एक से सौ तक, फिर भी न कह पाता हूँ ।। 

सीप हज़ारो सागरतट से, चुग-चुग कर उठाये है । 

एक माप के फिर भी ढंग से, जमा नहीं हो पाए है ।।

जिस रास्ते जाते हो हर दिन, मुझे भी उसपे टहला लो —

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

एक पैर पर खड़ा हुआ मैं, उचक-उचक कर बढ़ा आगे ,

कोई न था जिसको चिढ़ाता, किथ-किथ लंगड़ी में हरा के ।। 

देख कर बैठा हूँ मैं, चल-चित्र सारे नए-पुराने ,

आया हूँ मैं पास तुम्हारे, अब क्या होगा ये बताने।। 

देवदार की शाखा चढ़ कर, मेरा नाम भी चिल्ला लो —

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

टीले पर फिसला-गिरा मैं, मटमैली पोशाक,

रंगी है दीवारे चुरा के, श्यामपट्ट की चाक ।।

उस्तानी की मार से ज़ख़्मी, अहम् मुझे है छल रहा,

छत पर चढ़ के इंद्र-धनुष को, छू-छूकर मैं चल रहा ।।

अपनी कागज़ की नाव का केवट, मुझे भी तुम बना लो,

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

तुम्हारी ऊच में रोटी पका कर, मुझे भी नीच पे जाना है ।

पड़ोस की घंटी बजा कर, मुझे भी संग छिप जाना है ।।

कल आया जो नया गाना वो, मुझे भी गुन-गुनाना  है ।

रेस लगा कर फ़िनिशी लाइन पर, मुझे भी दौड़ आना है ।।

मेरे साथ भी तुम वो कठिन, पहेलियों सुलझा लो,

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

जन्मदिन पर बन कर राजा, भाव की दावत खानी है ।

चाँद पर साँधे निशाना, मुझे भी गुलेल चलानी है ।।

मगर कैसे मैं तुम्हें समझाऊ, उलझी मेरी कहानी है,

कैसे भरता घड़ा मेरा ये, मिट्टी ही मुल्तानी है ।।

अपने झूले पर दे कर धक्का, मुझे भी तुम झुला लो,

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

शाम को घर जो देर से आया, मैं भी डाँट खाता हूँ ।

दंत-परी को दे कर रिश्वत, मैं भी स्मित मुस्काता  हूँ ।।

मुझे भी डब्बे की सब्ज़ी, ना पसंद हमेशा आती है ।

मन करता है विनिमय का पर, खानी ही पड़ जाती है ।।

बारिश में जब केंचुए पकड़ो, मुझे भी तुम बुला लो,

क्यों ना तुम मुझे भी, अपने साथ खिला लो !

मगर अफ़सोस मैं चालीस की उम्र में हीं पैदा हुआ था,

सिर्फ़ रेत ही भरी हो जिसमे, मैं ऐसा कुआँ था ।।।

बचपन हमेशा से . . .  मेरे लिये एक अनुस्वाद ही था  ।

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All life is bound together by mutual support and interdependence.

Acharya UmaswaTi