इस कविता का रचयिता ही इस कविता का विषयवस्तु भी है । एक कलाकार, जिसको महल तो बनाना था, मगर ईंट-चूने का नहीं । एक कलाकार, जिसको एक सागर दिखाई तो देता था, मगर जल का नहीं । एक कलाकार, जिसका वक़्त बीतता तो था, मगर पहरो में नहीं । किसमे बीतता था? दिनकर, निराला, और कबीर में ।
कागज़ की थी नाव, मुसाफ़िर
जिसका वह बन पाया था ।
चप्पू बनकर पवन का झोंका,
तट से उसको लाया था ।।


क्षीर-गगन से चुन ली उसने,
चील मगन की पर-परछाँव ।
दिनकर की मंजुल किरणों से,
चलते उसके दफ़्तर-गाँव ।।
मूल छवि को करके रोशन,
उसकी उज्जवल आँखों ने फिर –
देख लिया इक आगम भय और,
मोड़ लिया उसका ही सिर ।।


छोड़ चला साहिल की संधि,
क्यों था निकला वह उस पार ?
क्या था आखिर कष्ट उसे कि,
सेंध दिया मानक व्यवहार ??
सहम गया इन प्रश्नों से वह,
फ़ेर ली किश्ती घर की ओर ।
कल्पित सागर के ख्वाब से क्यूं ही,
चला था वह होकर विभोर ।।


दु:खी हताश उसने निर्मोही,
जमा किये गहने-गुल्लक ।
किया सुनिश्चित उसको न कोई,
कह पायेगा “नालायक” ।।
दिन-रात लगा तब उसने श्रम से,
बना लिया इक महल अजान ।
बरस बाद ऊपर से गुज़रा,
नभ-तिमिर में द्रुत विमान ।।


देख उसे, अंकुश खोकर, उठ
चला हमारा “कलाकार” ।
लगा उसे आया है मिलने,
चील पुराना मिलनसार ।।
जो पथ था बचपन में इक खेल,
वह लगा था अब उसको दुश्वार ।
पदचिह्नों को भू-क्षरण ने,
बना दिया ओझल गद्दार ।।


कांप गया वह मंज़र से,
भूमि पर फिसले उसके पाँव ।
न मिला समंदर, न समीर, और
न ही वह कागज़ की नाव ।।।
