
एक वर्ष हो गया है पूरा, कलम पकड़ नहीं पाता हूँ,
तुम हो दोषी, डरता मैं हूँ, जब भी हाथ बढ़ाता हूँ।
नाज़ुक है कविता मेरी, यह ख़ुद से ना चल पाएगी,
तुम्हारे बिन अस्तित्त्व न इसका, कच्ची है डर जाएगी,
यह सब मैं हिंदी से कह रहा हूँ – हाँ, हिंदी भाषा से। भाषा में बात तो बहुत कर ली, सोचा अब भाषा से भी थोड़ी बात कर ली जाये।
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एक वर्ष हो गया है पूरा, कलम पकड़ नहीं पाता हूँ,
तुम हो दोषी, डरता मैं हूँ, जब भी हाथ बढ़ाता हूँ।
नाज़ुक है कविता मेरी, यह ख़ुद से ना चल पाएगी,
तुम्हारे बिन अस्तित्त्व न इसका, कच्ची है डर जाएगी –
इसकी ख़ातिर ही चलो सही, ईश्वर से विनती करता हूँ,
तुम से पहले मैं मर जाऊ, ऐसी आशा करता हूँ।
पर-
मैं उस आशा में रहूँ हीं क्यों, जो आशा ही तरसाएगी? (२)
मैं उस भाषा में लिखूँ हीं क्यों, जो भाषा ही मर जाएगी?

इससे तो बचपन ही अच्छा था, कम-से-कम तुम्हारा घर्षण हर दिन दिखाई तो नहीं देता था।एक दुबले, लतखोर बच्चे ने, एक छोटे से गांव में रहकर बड़े-बड़े सपने देखे थे। तुमने उसकी एक न सुनी।

नन्हा-सा बालक था मैं, चलना ढंग से नहीं आया था,
मुख से निकला पहला स्वर, जो सबको बहुत लुभाया था,
जब क्या होती है भाषा, किसी ने ये तक नहीं बताया था,
इतने सालो पहले, हे हिंदी, तुमने मुझे अपनाया था।
“सारे जहाँ से अच्छा” गाकर, धुन में चलता जाता था,
हर कविता कंठस्थ किए मैं, बिन अवसर ही गाता था,
जो मिल जाये राह में उसको, एक बात बतलानी थी,
खूब लड़ी मरदानी, वह तो, झाँसी वाली रानी थी।


“मातृभाषा” कहकर तुमको, गर्व से सर उठाया था,
“हिंदी है हम” के नारे के संग, मैंने ध्वज फहराया था,
दिनकर-बच्चन का तो तुमने, खूब साथ निभाया था,
मुझ से करके धोखा फ़िर क्यों, मेरा दिल दुखाया था?
एक भाषा में हँसते-रोते, गांव में बचपन निकल गया,
बड़े शहर विद्यालय जाकर, परिप्रेक्ष्य ही बदल गया,
साहित्य-ज्ञान-इतिहास-गणित सब, मेरे लिए नामुमकिन था,
एक विदेशी भाषा में ही, पढ़ना-लिखना मुमकिन था।

अब तुम ही बताओ हिंदी, तुम कौन हो? कौन हो तुम? क्योंकि तुम भाषा तो नहीं हो सकती।

जिस भाषा में ज्ञान-बोध के शब्दों की परिभाषा नहीं,
जिस भाषा में जटिल पंक्तियां कह पाने की आशा नहीं,
जिस भाषा का पंडित केवल अध्यापक ही बन पाए,
माफ करना हिंदी, लेकिन तुम सब कुछ हो पर भाषा नहीं।
बात-चीत हो केवल जिसमें, क्या वो पूरी भाषा है? (२)
क्या उस भाषा को कहूँ मैं भाषा, या वो सिर्फ़ तमाशा है?
जिस भाषा में आधे शब्दों को कोशो में तलाशा है,
जिस भाषा में पूछो कुछ भी, मिलती सिर्फ़ निराशा है।


जिस भाषा के वक्ता ही ख़ुद, दो पंक्ति ना कह पाते,
जिस भाषा के श्रोता ही न, परिपक्वता दिखलाते,
जो चंद बचे वक्ता-श्रोता, उन्हें भी इक दिन मरना होगा,
अफ़सोस मगर इस भाषा को उस दिन, मृत घोषित ही करना होगा।
आगे आने वालो को हिंदी, कैसे बड़ा करोगी तुम? (२)
यंत्र तो तुमसे न चलते, कब तक अख़बार पढ़ोगी तुम?
जो भाषा औपचारिकता में, ख़ुद ही को स्वयं टटोलेगी,
किस कारण से अगली पीढ़ी, ऐसी भाषा बोलेगी?

खैर, मैं व्यर्थ ही भाषा को कोस रहा हूँ।

भाषा को दे रहा हूँ गाली, भाषा की गलती नहीं है, (२)
उस देश की भाषा क्या चलती, जिस देश की ख़ुद चलती नहीं है,
जो राज किया अंग्रेजो ने, उसका तो क्या कर सकते है –
अब कहा जाना है यहाँ से हम, इस बात पे चर्चा करते है।
मृत्यु तो तय है भाषा की, उसे दर्दनाक क्यों करते हो? (२)
वस्त्रहीनता को अपनी तुम, शर्मनाक क्यों करते हो?
साल में इक-दिन क्यो ही तुम, ऐसा उपहास मचाते हो,
की जिस भाषा में सांस न लेते, उसका दिवस मनाते हो?


(हँसी) देखें है ना आपने, “हिंदी दिवस” के संदेश? जो लोग अंग्रेज़ी में भेजे देते हैं?
दिवस कम, जयंती ज़्यादा लगता है मुझे वह दिन।
जिसमें न पढ़ते-लिखते हो, न काम-काज करते हो तुम,
उसे बुलाकर मातृभाषा, किसे भ्रमित करते हो तुम?
अरे छोड़ दो ऐसी भाषा को, इसे धीरे-धीरे मारो मत,
एक नई लड़ाई लड़ने निकलो, यहाँ धीरे-धीरे हारो मत।

और ये किसी और की समस्या नहीं है। यह आपकी, हमारी, हमारे देश की ही जंग है – जो हम हार चुके है। और कुछ लोग होंगे, जिन्होंने इस हार में भी घमंड ढूँढ लिया है। तो उन लोगो से कहना चाहूँगा –

जितने हो स्वयं पे गर्वित, उतने तुम हिल जाओगे, (२)
शून्य का आविष्कार किया ना, शून्य में तुम मिल जाओगे,
जिन वेद-पुराणों के दम पे तुम, झूठा गौरव दिखलाते हो,
उन वेद-पुराणों की भाँति तुम, विस्मृत हो मिट जाओगे ।
एक नहीं, लाखों भाषाओं की भूमि भारतमाता, (२)
अंग्रेज़ी इकलौती भाषा, जिसमें वार्ता कर पाता,
अभी ज़्यादा मैं न बोलूँगा, वरना दंगे हो जाएँगे,
पर क्या एक-रूप वर्दी की खातिर, सब नंगे हो जाएँगे?


जिसकी भाषा जो है उसको, ही लेकर मर जाएगी, (२)
जिस देश में गंगा मैली है, उस देश बीमारी लाएगी।
और भूल के भी तुम ये न कहना, की तुम इससे बच जाओगे,
जब ख़ुद को मिटता पाओगे तुम, सबसे पहले पछताओगे।
भाषा मरती है तो केवल शब्द नहीं मर जाते है, (२)
गीत लोरियो ग्रंथों को सिर्फ़ मौन नहीं कर जाते है,
सपनों-रिश्तों, त्योहारो का अस्तित्व ख़त्म हो जाता है,
संस्कृतियों का ख़ाली दीपक धीरे-से बुझ जाता है।

अब आप बोलोगे की मैं उपाय नहीं दे रहा, सिर्फ़ परेशानिया गिना रहा हूँ। उपाय सुनना है? सुनना है? तो करो वादा –

तो करो वादा की अपनी भाषा को हिंदी न बोलोगे,
तो करो वादा की देशभक्ति को, भाषा-भक्ति न तोलोगे,
और चलो, अंग्रेज़ी में हम सब, इतने अच्छे हो जाए,
की जो भी हमसे अंग्रेज़ी में बात करे वो शरमाए। (२)
धन्यवाद!
रुकिए!
वैसे तो मैं इस कविता को यहीं समाप्त कर देता, मगर कुछ अधूरा-सा लग रहा है।
अभी रुको कुछ कहना बाक़ी, वो कहके ही जाएँगे, (२)
क्योंकि कुछ तो होंगे ऐसे जो की व्यंग्य समझ नहीं पाएंगे,
जो व्यंग्य समझ नहीं पाएंगे, और मुझ पर ही चढ़ जाएँगे,
यहाँ काट दिया इस कविता को तो मुझे काटने आएँगे।

तो उन लोगो से स्पष्ट कहूँ मैं-

तो उन लोगो से स्पष्ट कहूँ मैं, हिंदी मेरी भाषा है,
हर कविता को मेरी मैंने हिंदी में ही तराशा है,
किंतु झूठे आश्वासन हेतु झूठ नहीं मैं कह सकता,
इस कविता का मेरे संग मरना, और अभी मैं सह सकता।
भीष्म, कर्ण ने जान गवाकर अपना धर्म निभाया था,
वनवास बचा तब रामलला को, सिंहासन नहीं भाया था।
सारूप्य सिद्धांत से हम ने भी हिंदी में बोला है,
हार-जीत के कोसो आगे, सही-ग़लत को तोला है।। (२)

Thank you all, you’ve been a lovely audience. Hope you liked it!
